महाराष्ट्र के मानवत तालुका में दिहाड़ी मजदूर ने वीएलई बनने के बाद बदली किसानों और मजदूरों की जिंदगी

महाराष्ट्र के मानवत तालुका में दिहाड़ी मजदूर ने वीएलई बनने के बाद बदली किसानों और मजदूरों की जिंदगी

50 वर्षीय जालिंदर बलांडे सीमांत किसान हैं और महाराष्ट्र में परभनी जिले के कुम्भारी गांव में सोयाबीन की खेती करते हैं. साल 2019 में  बहुत ज्यादा बारिश होने के वजह से इनकी खरीफ की फसल पूरी तरह से बर्बाद हो गई. लेकिन राहत की बात यह है कि वीएलई संतोष केकरजवलेकर ने उनके फसल का बीमा किया था जिसकी वजह से  जालिंदर को  50,000 रु. मुवावजे के रूप में मिल गया. महाराष्ट्र के इस इलाके में आए दिन किसानों को प्राकृतिक आपदा की वजह से फसल बर्बादी का सामना करना पड़ता है. वीएलई संतोष केकरजावलेकर ने परभनी जिले के करीब 1500 किसानों का फसल बीमा किया है ताकि बुरे वक्त में उनकी मदद हो सके.

हाले के वर्षों में कृषि के व्यावसायीकरण की वजह से भारत के किसानों के ऋण जरूरतों में वृद्धि हुई है, लेकिन बार-बार फसल खराब होने के कारण अधिकांश छोटे और सीमांत किसान बैंकों से ऋण नहीं ले सकते हैं। अखिल भारतीय ऋण और निवेश सर्वेक्षण (एआईडीआईएस) के अनुसार, ज्यादातर किसान फसल बर्बादी की वजह से कर्ज के बोझ तले दबे रहते हैं। 2014 में, 46 प्रतिशत कृषक परिवार 70,580 रु. की औसत राशि के साथ कर्ज में दबे थे। इसी सर्वे के मुताबिक पेशेवर साहूकारों ने 29.6 प्रतिशत कृषि ऋण दिया था और यह हिस्सेदारी अधिकतम थी. इससे पता चलता है कि ग्रामीण परिवार अभी भी आसान ऋण के लिए उन पर ही निर्भर हैं। साहूकारों की शोषणकारी प्रवृत्ति किसानों में ऋणग्रस्तता पैदा करती है, जिससे उन्हें आगे उत्पादन के लिए ऋण लेने से वंचित होना पड़ता है. महाराष्ट्र के ये छोटे किसान मनरेगा मजदूर भी हैं, इसलिए कर्ज के तले दबने के बाद इनको चौतरफा मार का सामना करना पड़ता है.

इन सबके बीच सबसे बड़ी राहत की बात यह है संतोष जैसे वीएलई किसानों के बीच जाकर फसल बीमा की जागरुकता पैदा करते हैं और उनके खेत में ही जाकर बीमा भी कर देते हैं. यही नहीं, वीएलई संतोष केकरजवलेकर ने महात्मा फूले सेतकरी सम्मान योजना के तहत 500 किसानों को और छत्रपति सेतकरी सम्मान योजना के तहत 300 किसानों को कर्ज से मुक्ति दिलाया है.

लेकिन 39 साल के संतोष के लिए यहां तक पहुंचने की राह आसान न थी. संतोष ने गांव के पास के क़ॉलेज से 12 वीं की परीक्षा पास की. घर की माली हालत काफी खराब थी और संतोष के ऊपर परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी आ गई.

एक कहावत है कि ‘सौ मील का सफर पहले कदम से शुरू होता है।’ इस कहावत को संतोष ने चरितार्थ करके दिखाया है जो शून्य से शुरू होकर आज शिखर तक पहुंच गया है। संतोष को फोटोग्राफी करने का जुनून था और इसी की वजह से उन्होंने एक फोटो स्टूडियो में दिहाड़ी मजदूर का काम करना शुरू कर दिया. वहीं रहकर खाली समय में कम्यूटर चलाना भी सीख लिया. और 500 रु. में एक कामचलाऊ कैमरा खरीदकर गांव के लोगों के लिए फोटोग्राफी करने लगे. गांव में उनकी पहचान बन गई. साल 2011 में एक स्थानीय अखबार में सीएससी का विज्ञापन देखा और सीएससी के लिए अप्लाई कर दिया और फिर शुरू हुई उनकी सीएससी यात्रा.  

मजदूरी छोड़ सीएससी उद्यम की तरफ बढ़ रहे संतोष केकरजावलेकर जैसे हजारों युवक देश में युवा सशक्तिकरण का अनूठा उदाहरण पेश कर रहे हैं। 

संतोष का सीएससी केंद्र परभनी जिले के मानवत तालुका के केकरजवला गांव में स्थित है. जो युवक कभी दूसरों के यहां मजदूरी करता था, दिनभर खटने के बदले में इन्हें 50 रुपए दिहाड़ी मिलती थी। लेकिन अब ये मजदूर नहीं बल्कि सफल उद्यमी हैं। मजदूरी छोड़ सीएससी उद्यम की तरफ बढ़ रहे संतोष केकरजावलेकर जैसे हजारों युवक देश में युवा सशक्तिकरण का अनूठा उदाहरण पेश कर रहे हैं। 

उन्होंने सिर्फ एक कंप्यूटर के साथ सीएससी शुरू की, आज उनके पास 7 कंप्यूटर हैं और 4 लोगों को अपने केंद्र में रोजगार दिया हुआ है। वह सीएससी सफलतापूर्वक चला रहे हैं और अपने गांव के कई युवकों के लिए एक उदाहरण हैं।

संतोष ने सिर्फ एक कंप्यूटर के साथ सीएससी शुरू की, आज उनके पास 7 कंप्यूटर हैं और 4 लोगों को अपने केंद्र में रोजगार दिया हुआ है। वह सीएससी सफलतापूर्वक चला रहे हैं और अपने गांव के कई युवकों के लिए एक उदाहरण हैं।

 परभनी जिले के रामेताकली, वजूर बीके, कुम्भारी, हमदापुर गांवों से हर रोज 150 से 200 लोग उनके केंद्र पर सीएससी सेवा लेने के लिए आते हैं. आज वो सीएससी की तकरीबन सभी सेवाएं अपने केंद्र से दे रहे हैं जिनमें प्रमुख हैं- फसल बीमा, पीएमजीदिशा, महा ई-सेवा केंद्र की योजनाएं, डिजी पे, आयुष्मान भारत, फ्लाइट बुकिंग, मोबाइल बिल भुगतान, रेलवे आरक्षण, पैन कार्ड आदि.

 उन्होंने आयुष्मान भारत के तहत भी जबरदस्त काम किया है और इस कार्यक्रम के तहत हाशिए के समुदायों के 900 लोगों को पंजीकृत किया है। उन्होंने आयुष्मान भारत के तहत मुफ्त इलाज का लाभ देने के लिए असाध्य रोग से ग्रस्त रोगियों की मदद की। वीएलई उनके घर गए और ई-केवाईसी पूरा किया। दैनिक वेतन और मनरेगा श्रमिकों के लिए, जो दिन के समय में आने में असमर्थ थे, उन्होंने आयुष्मान भारत कार्ड के लिए शिविर का आयोजन किया। संतोष के सीएससी केंद्र पर काम करने वाले अभी तक ऐसे 7 ऑपरेटर हैं जो आज खुद का या तो व्यवसाय चला रहे हैं या सीएससी का सफल संचालन करते हैं.

संतोष जैसे वीएलई ने देश में उद्यमशीलता का एक उदाहरण पेश किया है। गांवों के दूर दराज इलाके में रहने वाले ये उद्यमी इस काम के लिए प्रशिक्षित नहीं थी, परंतु उनके अंदर एक अद्भुत दृढ़ता थी। उन्होंने अपने सामान्य गुणों को विकसित किया और यही उनका हथियार बन गया।  

2 Responses to "महाराष्ट्र के मानवत तालुका में दिहाड़ी मजदूर ने वीएलई बनने के बाद बदली किसानों और मजदूरों की जिंदगी"

  1. Sanjay Kadam   March 12, 2020 at 1:22 pm

    Good work

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  2. Santosh Bhawankar   March 12, 2020 at 3:49 pm

    Excellent job santoshji keep it up best of luck .
    Yours best wisher
    Bhawankar santosh csc murumkhada

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