उत्तराखंड के सुदूर पहाड़ी क्षेत्र में सीएससी बना महिला सशक्तिकरण और रोजगार का केंद्र

उत्तराखंड के सुदूर पहाड़ी क्षेत्र में सीएससी बना महिला सशक्तिकरण और रोजगार का केंद्र

कुमाऊं स्थित कुदरती सुंदरता से सराबोर और बर्फ से लकदक हिमालयराज का दर्शन कराने वाले हिल स्टेशन में से एक है अल्मोड़ा. यहां दूर दराज पहाड़ी क्षेत्र में एक छोटा सा गांव है-बख. इस इलाके में आज भी महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़े मसलों को टैबू समझा जाता है.

वीएलई शंभू दत्त जोशी ने  उत्तराखंड के ब्लॉक हवालबाग, (जिला अल्मोड़ा) में अपने गाँव की लड़कियों और महिलाओं के जीवन में असाधारण बदलाव लाने के लिए एक साहसिक कदम उठाया है. शंभू दत्त जोशी बख दामूधारा  गांव में अपना सीएससी सेंटर चलाते हैं.  सीएससी एसपीवी की सहायता से, उन्होंने सस्ती, स्वच्छ और पर्यावरण के अनुकूल सैनिटरी पैड के निर्माण के लिए अपने गांव में साल 2018 में एक सैनिटरी नैपकिन निर्माण इकाई की स्थापना की. उनकी निर्माण इकाई ने गाँव में कमजोर तबके की 8 महिलाओं के लिए रोजगार भी प्रदान किया है, जो अपनी आजीविका कमाने के अलावा अपने समाज में बदलाव ला रही हैं. शंभू दत्त जोशी का सैनिटरी पैड केंद्र हर महीने 15,000 से अधिक नैपकिन का निर्माण करता है, उनकी टीम ग्राम पंचायत की मदद से स्कूल, कॉलेज और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में गहन जागरूकता कार्यक्रम चला रही है.

उन्होंने उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र के दूर दराज के गांवों में मासिक धर्म स्वच्छता पर 60 से अधिक विशेष जागरूकता शिविरों का आयोजन किया और लड़कियों और महिलाओं को 3000 मुफ्त नैपकिन वितरित किए और उनके बीच महिला स्वच्छता के बारे में जागरूक किया.

सीएससी यात्रा

43 वर्षीय शंभू जोशी को ग्रामीण महिलाओं के जीवन में आने वाली चुनौतियों को नजदीक से देखने का मौका मिला है. साल 2015 में उन्होंने सीएससी शुरू किया और जनवरी 2018 में उन्होंने सैनेटरी पैड यूनिट स्थापित किया. उनका यह यूनिट हवालबाग ब्ल़ॉक में काफी लोकप्रिय है.

वीएलई न केवल वंचित समुदायों में मासिक धर्म स्वच्छता के बारे में बड़े पैमाने पर जागरुकता फैला रहे हैं, बल्कि पीएमजीदिशा के तहत गरीब समुदाय के 400 से अधिक लोगों तक डिजिटल साक्षरता के लाभ भी पहुचाएं हैं. वीएलई शंभू कहते हैं, “सीएससी ने मेरे जीवन को बेहतर तरीके से बदल दिया है, मैं बहुत संतुष्ट हूं और अपने आप को सीएससी योजना का हिस्सा बनने के लिए भाग्यशाली मानता हूं.”

स्त्री स्वाभिमान परियोजना से जुड़ने के पहले उन्होंने तीन महीने रिसर्च का काम किया, जिससे उन्हें पता चला कि भारत में करीब 87 फीसदी महिलाएं सैनेटरी पैड्स का इस्तेमाल नहीं करती है और जो करती है, उन्हें भी प्लास्टिक-सिंथेटिक से सर्वाइकल कैंसर होने का खतरा होता है. उसके बाद उन्होंने पर्यावरण और स्वास्थ्य के अनुकूल पैड्स बनाने का काम शुरू किया.

वीएलई शंभू एक साथ कई काम कर रहे हैं. वो सैनेटरी नैपकिन भी बना रहे हैं. महिलाओं को स्वच्छता के लिए जागरुक कर रहे हैं और उन्हें रोज़गार भी दे रहे हैं.

उन्होंने अपने आसपास की कई महिलाओं को रोज़गार देकर आत्मनिर्भर बनाया. धीरे धीरे कई महिलाओं ने इस काम में हाथ बंटाना शुरू किया.  

वीएलई बताते हैं, “हमने सुनिश्चित किया कि ग्रामीण महिलाओं के लिए सही उत्पाद का निर्माण करें जो गुणवत्ता में अच्छी और सस्ती भी हो. कुछ दिशानिर्देश हैं जो निर्माताओं को सैनिटरी पैड बनाते समय पालन करना है और हमारी तकनीक हर एक मापदंड को पूरा करती है.” वे कहते हैं-प्रारंभ में इन महिलाओं के घरों में पुरुष सदस्य अपनी पत्नियों को घर से बाहर काम करने के लिए पसंद नहीं करते थे, लेकिन वीएलई शंभू हार मानने वाले नहीं थे. वह अपना काम करते रहे और धीरे-धीरे, जब लोगों ने काम का सकारात्मक प्रभाव देखा और महिलाओं के लिए यह अतिरिक्त आय पैदा हुई तो उन्होंने वीएलई के विचारों को स्वीकार करना शुरू कर दिया.

 भविष्य में वीएलई शंभू उत्तराखंड के हर जिले में अपनी पहल करना चाहते हैं और अधिक महिलाओं को सशक्त बनाना चाहते हैं। तकनीक इतनी सरल है कि अधिकांश महिलाएं बहुत कम प्रशिक्षण के बाद, पैड का निर्माण शुरू कर सकती हैं.

वीएलई शंभू की कहानी बताती है कि देश के दूर दराज के इलाकों में काम करने वाले वीएलई सीमित संसाधनों के बावजूद सामाजिक बदलाव लाने के साथ-साथ अपनी आर्थिक स्थिति को बेहतर करते हुए सामाजिक पहचान बनाने के लिए अठिग हैं.

भविष्य में वीएलई शंभू उत्तराखंड के हर जिले में अपनी पहल करना चाहते हैं और अधिक महिलाओं को सशक्त बनाना चाहते हैं।

एक समाज केवल उस हद तक समृद्ध होता है जिस तक वह उद्यमशीलता को पुरस्कृत और प्रोत्साहित करता है क्योंकि यह उद्यमी और उनकी गतिविधियाँ ही हैं जो किसी भी अर्थव्यवस्था में सफलता, समृद्धि और विकास के अवसर निर्धारित करती हैं. दुनिया में सबसे गतिशील समाज वे हैं जिनमें सबसे अधिक संख्या में उद्यमी हैं. इन देशों में उद्यमियों की अधिक से अधिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने और प्रेरित करने के लिए आर्थिक और कानूनी संरचना मौजूद है.

 वीएलई शंभू दत्त जोशी जैसे 4 लाख सीएससी उद्यमी आईसीटी तकनीके के जरिए देश के दूर दराज के गांवों में बड़ा बदलाव ला रहे हैं. वे ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देते हैं, आजीविका का निर्माण करते हैं और सामुदायिक भागीदारी के जरिए समावेशी विकास की धारणा को सुनिश्चित करते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published.