#सीएससी से ग्राम स्वराज: खेतिहर मजदूर ने बदली राजस्थान-हरियाणा के बॉर्डर पर स्थित दूर दराज के गांवों की तस्वीर

#सीएससी से ग्राम स्वराज: खेतिहर मजदूर ने बदली राजस्थान-हरियाणा के बॉर्डर पर स्थित दूर दराज के गांवों की तस्वीर

राजस्थान-हरियाणा के बॉर्डर पर एक गांव है-नालोई जो विकास से कोसों दूर है. नालोई पंचायत हरियाणा के भिवानी जिले के सीवानी ब्लॉक के तहत आता है. 6 महीने पहले यहां इंटरनेट की पहुंच एक सपने की तरह था.  देश के इस दूर दराज इलाके में ऑप्टिकल फाइबर बिछाना प्राइवेट कंपनियों के लिए अभी भी मुनाफे का सौदा नहीं है.

इस पृष्ठभूमि में वीएलई सुरेंद्र ने गांव में बदलाव लाने का बीड़ा उठाया. सीएससी वाईफाई चौपाल के तहत उन्होंने 22 पंचायतों में वाईफाई कनेक्टिविटी प्रदान की है.  

नालोई गांव में 9वीं कक्षा की छात्रा मीना की भी ज़िंदगी इंटरनेट ने काफ़ी हद तक बदल दी है. बकौल मीना, “लॉकडाउन के दौरान मेरी पढ़ाई बंद हो गई थी. स्कूल में जब ऑनलाइन पढ़ाई शुरू हुई तो इंटरनेट नहीं होने की वजह से मैं नाउम्मीद सी हो गई लेकिन वीएलई सुरेंद्र की मदद के बाद मुझे इंटरनेट कनेक्टिविटी मिल गई. मैं अब अपनी पढ़ाई जारी रख सकती हूं.”

वाई फाई चौपाल ने यहां पीडीएस के लाभार्थियों की भी बड़ी मदद की है. भारत सरकार ने भ्रष्टाचार रोकने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को डिजिटाइज कर दिया है लेकिन नालोई में इंटरनेट नहीं होने की वजह से गांव वालों को बॉयोमेट्रिक पहचान के लिए सीवानी जाना पड़ता था लेकिन अब गांव में ही कनेक्टिविटी आ जाने के बाद पीडीएस डिपो पर ही बॉयोमेट्रिक पहचान पूरी करके राशन मिल जाता है.

सीवानी में गांव के स्कूली बच्चे और युवा वाई फाई की मदद से अपनी पढ़ाई कर रहे हैं.

नालोई पंचायत समेत कई गांवों में यह पहल तमाम गरीब महिलाओं के लिए रोजगार का जरिया बने हैं. नालोई में कई जगह पर चिकनकारी करने वाली महिलाओं को नए डिजाइन इंटरनेट की मदद से सीखाए जा रहे हैं.

वीएलई की सीएससी यात्रा

29 साल के वीएलई सुरेंद्र की सीएससी यात्रा भी कम दिलचस्प नहीं है. चार साल पहले वो अपने पिता के साथ गांव में बंटाई पर किसानी करते थे. घर की माली हालत ठीक नहीं थी. लेकिन डिजिटल इंडिया प्रोग्राम के तहत सीएससी की जानकारी मिलते ही उन्होंने आईडी के लिए अप्लाई किया और 2017 में उन्होंने नालोई पंचायत से सीएससी शुरू किया. आज उन्होंने अपने सेंटर पर तीन ग्रामीणों को रोजगार भी दिया है. जो युवक कभी दूसरों के खेतों में मजदूरी करता था, दिनभर खटने के बदले में इन्हें 50 से 100 रुपए दिहाड़ी मिलती थी. लेकिन अब ये मजदूर नहीं बल्कि सफल उद्यमी हैं. मजदूरी छोड़ सीएससी उद्यम की तरफ बढ़ रहे सुरेंद्र जैसे हजारों युवक देश में ग्रामीण सशक्तिकरण का अनूठा उदाहरण पेश कर रहे हैं.

वीएलई सुरेंद्र की टीम पूरे उत्साह के साथ गावों को डिजिटल बनाने के काम में जुटी है

टेली मेडिसिन से ग्रामीणों को मिल रही स्वास्थ्य सुविधा

वीएलई सुरेंद्र गांव में  टेली मेडिसिन की सेवा भी प्रदान करते हैं. इसके सहारे गांव के मरीजों को अपोलो के चिकित्सकों से परामर्श मिल रहा है. वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए मरीज अपनी परेशानी चिकित्सक को बताते हैं, जिसके आधार पर उनका पर्चा लिखा जा रहा है. यह पर्चा वहां से स्कैन कर भेजा जाता है, जिसका प्रिंटआउट मरीज को उपलब्ध करा दिया जा रहा है.

मरीज को इसके लिए अस्पताल का एक रुपये का शुल्क लिया जाता है. चिकित्सक को अगर लगता है कि मर्ज के संबंध में हायर सेंटर से परामर्श की जरूरत है तो वह टेली मेडिसिन सेंटर रेफर कर देता है. इसके बाद एक निशुल्क फार्म भरवाकर यह सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है. इससे जहां सिवानी ब्लॉक के लोगों को स्थानीय स्तर पर बेहतर इलाज की सुविधा मिल रही है वहीं जिले के अस्पताल पर मरीजों का बोझ कम हुआ है.

डिजिटल क्रांति और उद्यमशीलता

सीएससी के जरिए न केवल डिजिटल क्रांति गांव नालोई तक पहुंची है, बल्कि उद्यमी की कमाई में भी काफी वृद्धि हुई है. सीएससी के माध्यम से, दूर-दराज के इलाकों में रह रहे ग्रामीण निवासियों के दरवाजे पर सेवा प्रदान की जाती है. सीएससी समय और लागत प्रभावी तरीके से सेवाओं का लाभ उठाने में उनकी मदद कर रहा है. वीएलई कहते हैं: “केवल मेरा ही नहीं, बल्कि सीएससी ने बेहतरी के लिए सभी का जीवन बदल दिया है. मैं एक वीएलई के रूप में सीएससी से जुड़ा हुआ हूं. यह मेरे लिए गर्व का क्षण है.” (पाठक अपने सुझाव और प्रतिक्रिया  dhirendra.singh@csc.gov.in पर भेज सकते हैं.)

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