वीएलई सोनू जो पहले घर घर दूध पहुंचाने का काम करते थे, आज यूपी के दूरदराज गांव कूड़ा मीरपुर के युवाओं को दे रहे हैं रोजगार

वीएलई सोनू जो पहले घर घर दूध पहुंचाने का काम करते थे, आज यूपी के दूरदराज गांव कूड़ा मीरपुर के युवाओं को दे रहे हैं रोजगार

वक़्त और हालात कब बदल जाये ये कोई नहीं जानता. लेकिन बहुद हद तक हमारी जिंदगी की दशा और दिशा इस बात पर निर्भर करती है की हम बुरे हालात का सामना कैसे करते हैं. उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले में कूड़ा मीरपुर (ब्लॉक-छजलैट) के रहनेवाले सोनू सिंह की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. वक़्त और हालात से लड़कर सोनू ने ना सिर्फ अपने परिवार को सहारा दिया, बल्कि सिर्फ 22 साल की उम्र में गांव के 23 युवाओं को रोजगार भी दिया है. आज सोनू एक सफल उद्यमी हैं और उनके संघर्ष की कहानी जानकर कोई भी प्रेरित हुए बिना नहीं रह सकता.

सोनू ने साल 2013 में हाईस्कूल पास किया. 2014 में जब उन्होंने सीएससी खोलने को सोचा तो उनके परिवार के पास लैपटॉप खरीदने के पैसे नहीं थे. इनका परिवार घर-घर जाकर दूध बेचता है और इनके पास एक भैंस भी थी. सोनू की माता जी को उनके कठिन परिश्रम और प्रतिभा पर पूरा भरोसा था. सो, उन्होंने पैसे के जुगाड़ के लिए अपनी भैंस ही बेच दी.    

सोनू ने जब काम करने का फैसला किया तो कम उम्र और किसी भी व्यवसाय का तजुर्बा ना होना, ये दो सबसे बड़ी मुश्किलें थीं जिनसे उन्हें पार पाना था. इस दौर में उनको परिवार का पूरा सहयोग मिला.  सोनू बताते हैं, “2014 में एनडीएलएम के तहत मैंने 50 बच्चों को प्रशिक्षित किया. इससे जो पैसे मिले, मैंने एक प्रिंटर और आधार मशीन खरीदकर घर घर जाकर आधार कार्ड बनाने का काम शुरू कर दिया. मैंने 3000 लोगों के आधार कॉर्ड बनाए.”

“मेरे 3 भाई और एक बहन हैं. आधार का काम करते हुए मैं प्राइवेट बीए करने लगा लेकिन मैं नियमित BCA करना चाहता था और उसके लिए पैसे कम थे. 2016 में PMGDISHA में कार्य किया जिससे मिले पैसे से मैंने 2017 में BCA में आईएफटीएम यूनिवर्सिटी-मुरादाबाद में प्रवेश ले लिया और अपनी सीएससी पर दो युवाओं रोहित ओर रिंकू को काम दिया. साल 2018 में मैंने PWD स्किल के लिए कार्य किया उससे मिले पैसे से बाकी दोनों साल की फीस जमा किया. सीएससी की कमाई से अपने भाई बहन की पढ़ाई का खर्च उठाया.”

सोनू अब BCA की पढ़ाई पूरी कर चुके हैं. जिसमें इस वर्ष 93 % और तीनों वर्ष मिलाकर 74.70% अंक प्राप्त किए.

सोनू के लिए, एक उद्यमी होना पहला वास्तविक काम था जिसने उनके जीवन में “360-डिग्री परिवर्तन” लाया. “यह व्यवसाय न केवल मेरे कौशल को प्रदर्शित करने का एक अवसर है, बल्कि मुझे इस तरह के एक चुनौतीपूर्ण समाज में रहने का विश्वास भी दिलाता है,” सोनू ने बताया.

आर्थिक गणना में वीएलई सोनू ने 95,000 परिवारों का सर्वेक्षण किया है. इस काम में उन्होंने 18 लोगों को रोजगार भी दिया है.

सोनू के सीएससी लाभार्थियों में से एक 24 साल के जहांगीर अहमद, शाह मुबारकपुर के निवासी हैं. वो बीपीएल परिवार से हैं. वीएलई ने उनको दिव्यांग कौशल कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षित किया है. जहांगीर आज एक संस्थान में कंप्यूटर ऑपरेटर का काम करते हैं. छजलैट ब्लॉक में जहांगीर जैसे 200 युवा आज सीएससी की वजह से अपने पैरों पर खड़े हैं.

वीएलई कहते हैं, “इनमें से कई बच्चे कमजोर परिस्थितियों में हैं और प्रवासन, घरेलू हिंसा, बाल श्रम या कभी-कभी ऐसी सांस्कृतिक मान्यताओं से प्रभावित हैं, जहां विशेषकर लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा नहीं मिलता है.”

मजदूरी छोड़ सीएससी उद्यम की तरफ बढ़ रहे सोनू जैसे हजारों युवक देश में युवा सशक्तिकरण का अनूठा उदाहरण पेश कर रहे हैं. उन्होंने सिर्फ एक कंप्यूटर के साथ सीएससी शुरू की, आज उनके पास 15 कंप्यूटर हैं और 22 लोगों को अपने केंद्र में रोजगार दिया हुआ है. वह सीएससी सफलतापूर्वक चला रहे हैं और अपने गांव के कई युवकों के लिए एक उदाहरण हैं.

कोविड महामारी ने उजागर किया है कि ग्रामीण और शहरी स्कूली शिक्षा के बीच संरचनात्मक असंतुलन कितना अधिक है.  शिक्षा क्षेत्र में बच्चों और युवाओं के अध्ययन में व्यवधान हुआ है. हालांकि इससे दूरस्थ शिक्षा के लिए संभावनाएं खुल गईं, लेकिन साथ ही इससे आर्थिक, सामाजिक, डिजिटल और शैक्षिक असमानताओं से जुड़ी चुनौतियां भी सामने आई हैं. वीएलई सोनू ने इस महामारी के दौरान आस पास के गांवों में एक बड़ी आबादी को ऑनलाइन शिक्षण उपलब्ध कराया है. डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग शिक्षण सामग्री को अपलोड करने और देखने, लाइव पाठ आयोजित करने और असाइनमेंट देने और मूल्यांकन करने के लिए किया गया.  

इस गांव में लगभग दो तिहाई घरों में इंटरनेट कनेक्टिविटी नहीं है. लेकिन सोनू जैसे डिजिटल शिक्षकों को धन्यवाद जो दूरस्थ शिक्षा के साधनों के माध्यम से इन स्कूली बच्चों की मदद कर रहे हैं.

 बकौल सोनू-“सीएससी के साथ, शिक्षा का एक नया हाइब्रिड मॉडल इस दूर दराज गांव में उभरा है, जिससे गांव के लोगों को बहुत लाभ हुआ है. मुझे विश्वास है कि शिक्षा में आईसीटी एकीकरण को और तेज किया जाएगा और सीएससी के माध्यम से ऑनलाइन शिक्षा अंततः इस क्षेत्र में स्कूली शिक्षा का एक अभिन्न अंग बन जाएगी.”

 शिक्षा के अलावा,  वीएलई ने 3000 आयुष्मान भारत कार्ड बनाए हैं. मुरादाबाद के कूड़ा मीरपुर, शुक्ला किशनपुर, नकसंदबाद, अली नगर, बैरमपुर, चेंगेरी, जमालपुर गांवों के लोग सोनू के सीएससी से लाभान्वित हो रहे हैं.

 वीएलई सोनू के सीएससी केंद्र पर काम करने वाले अभी तक ऐसे 7 ऑपरेटर हैं जो आज खुद का या तो व्यवसाय चला रहे हैं या सीएससी का सफल संचालन करते हैं.

सोनू जैसे वीएलई देश में उद्यमशीलता का एक उदाहरण पेश कर रहे हैं. गांवों के दूर दराज इलाकों में रहने वाले ये उद्यमी इस काम के लिए प्रशिक्षित नहीं थे, परंतु उनके अंदर एक अद्भुत दृढ़ता थी. उन्होंने अपने सामान्य गुणों को विकसित किया और यही उनका हथियार बन गया.

Leave a Reply

Your email address will not be published.